बस्तर दशहरा पूरे भारत में अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलता है और देवी दंतेश्वरी को समर्पित होता है। इस दशहरे में न तो रावण दहन होता है और न ही रामलीला का मंचन, बल्कि यहाँ आदिवासी आस्था और परंपरा केंद्र में रहती है।
बस्तर दशहरा की शुरुआत हरेली अमावस्या से होती है और इसका समापन विजयादशमी पर होता है। इस दौरान अलग-अलग जनजातियाँ अपने पारंपरिक वेशभूषा में देवी की पूजा करती हैं। रथ यात्रा, विशाल झांकी और पारंपरिक वाद्य यंत्र इस पर्व की विशेषता हैं।
यह पर्व बस्तर की सामाजिक एकता का प्रतीक है। अलग-अलग गाँवों के लोग एक साथ आकर उत्सव मनाते हैं। बस्तर दशहरा न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है बल्कि यह पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है।

